MUGHAL HISTORY IN HINDI मुग़ल साम्राज्य का इतिहास

मुग़ल साम्राज्य का इतिहास (Mughal History in Hindi): भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना 1526 में दिल्ली सल्तनत के उन्मूलन के साथ मुग़ल सम्राट बाबर द्वारा प्रारम्भ होती है। 

इस दौरान मुग़ल साम्राज्य में कुछ शक्तिशाली शासक भी हुए। जिनमे बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहांगीर, शाहजहां तथा औरंगजेब आदि प्रमुख थे।

मुग़लों ने भारत में एक विशाल एवं शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने हर दिशा में अपने राज्य का विस्तार किया।

मुग़ल साम्राज्य के दौरान भारत में स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदहारण देखने को मिलता है। इस दौरान अनेक प्रसिद्द इमारतों का निर्माण किया गया।

इस पोस्ट में हम मुग़ल साम्राज्य के इतिहास (About Mughal Empire in Hindi) पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे। यहाँ पर मुग़ल साम्राज्य के शासकों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।

मुग़ल शासकों की सूची List of Mughal Emperor In Hindi

  1. जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (1526 – 1530 ई.)
  2. नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ (1530-1540 ई.)
  3. जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर (1556 – 1605 ई.)
  4. नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर (1605-1627 ई.)
  5. शाहजहां (1628 -1658 ई.)
  6. मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब (1658 – 1707 ई.)
  7. बहादुरशाह प्रथम (1707 – 1712 ई.)
  8. जहाँदारशाह (1712-1713 ई.)
  9. फर्रुखसियर (1713-1719 ई.)
  10. मुहम्मदशाह (रंगीला) (1719-1748 ई.)
  11. अहमदशाह(1748-1754 ई.)
  12. आलमगीर द्वितीय (1754-1759 ई.)
  13. शाहआलम द्वितीय (1760-1806 ई.)
  14. अकबर द्वितीय (1806-1837 ई.)
  15. बहादुरशाह द्वितीय (1838-1857 ई.)

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (1526 – 1530 ई.)

बाबर का जन्म 14 फरवरी 1483 को फरगना में हुआ। बाबर के पिता का नाम शेख मिर्जा तथा माता का नाम कुल्लूक निगम खानम था।

बाबर का पिता शेख मिर्जा तैमूर लंग का वंशज था जो फरगना के एक छोटे से राज्य में शासन करता था। बाबर की माँ मंगोल सरदार यूनुस खाँ की पुत्री थी।

इस प्रकार बाबर पिता की ओर से तैमूर लंग तथा माता की ओर से मंगोलों का वंशज था।  निडर होने के कारण ही उसे बाबर के नाम से पुकारा जाता था। पिता की मृत्यु के बाद बाबर फरगना का शासक बना।

बाबर का भारत पर आक्रमण: बाबर ने भारत पर पहला आक्रमण 1519 ई. में किया जिसमे उसने बाजौर और भीरा पर अपना अधिकार कर लिया।

1519 ई. में फिर बाबर ने दूसरी बार भारत पर आक्रमण किया जिसमे वह यूसुफजई अफगानों पर अपना कब्ज़ा करके पेशावर पर अधिकार जमाना चाहता था लेकिन बदख्शां में उपद्रव होने के कारन वह इस आक्रमण को बीच में ही छोड़कर चला गया।

1520 में बाबर ने तीसरी बार भारत पर आक्रमण किया। इस बार वह बाजौर, भीरा से आगे स्यालकोट तक पहुंच गया। लेकिन तभी कंधार में बगावत होने के करना उसे कंधार जाना पड़ा और 1522 में उसने कंधार पर अधिकार कर लिया।

1524 में बाबर ने चौथी बार भारत पर आक्रमण किया। दिल्ली के शाशक इब्राहिम लोदी ने पंजाब में अपनी सेना भेजकर लाहौर पर अधिकार कर लिया। जिसके बाद बाबर ने पंजाब पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में कर लिया। फिर वह काबुल वापस चला गया।

काबुल जाने के बाद दौलत खां और उसके चाचा आलम खान ने दिल्ली पर आक्रमण किया लेकिन इब्राहिम लोदी ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद वे दोनों बाबर की शरण में पहुंचे। जिसके बाद 1525 में बाबर विशाल सेना लेकर भारत की ओर बढ़ा। बाबर ने पंजाब पर अपना अधिकार कर लिया।

12 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाओं का आमना-सामना हुआ। 9 दिन तक सेनाएं एक दूसरे के सामने रही। फिर 21 अप्रैल को दोनों सेनाओं के बीच में भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ। अंत में बाबर की सेना ने इब्राहिम लोदी की सेना पर विजय प्राप्त कर ली।  इब्राहिम लोदी भी इस लड़ाई में मारा गया।

इस प्रकार पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया और दिल्ली तथा आगरा पर अपना अधिकार कर भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी। अब बाबर दिल्ली का बादशाह बन गया।

अब बाबर दिल्ली का बादशाह बन गया। 27 मार्च 1527 में बाबर और राणा राणा सांगा के मध्य खानवा का ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में राणा सांगा को बाबर के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी।

इसके बाद 1528 में बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया और उसे अपने अधीन कर लिया। 1529 में बाबर ने घाघरा के युद्ध में अफगानों को हराया। इस युद्ध में बाद सम्पूर्ण उत्तर भारत पर बाबर का अधिकार हो गया।

घाघरा के युद्ध के बाद बाबर आगरा लौट गया। वहां बाबर बहुत बीमार हो गया। 26 दिसंबर 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गयी।

बाबर का विस्तृत इतिहास जानने के लिए यहाँ क्लिक करें: बाबर का इतिहास और जीवन परिचय

Mughal History in Hindi

नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ (1530-1540 ई.)

हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 में काबुल में हुआ था। हुमायूँ बाबर का सबसे बड़ा पुत्र और मुग़ल साम्राज्य का उत्तराधिकारी था। पानीपत और खानवा के युद्ध में हुमायूँ ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था।  हुमायूँ ने 30 दिसंबर 1530 को आगरा की गद्दी संभाली।

अपने शासनकाल के दौरान हुमायूँ को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 1539  के चौसा के युद्ध में हुमायूँ को शेरशाह से हार का सामना करना पड़ा। 1540 में बिलग्राम अथवा कन्नौज के युद्ध में फिर शेरशाह ने हुमायूँ को हराया और हुमायूँ को  भारत छोड़कर जाना पड़ा।

1555 में करीब 15 वर्षों के निष्काशन के बाद हुमायूँ ने सिकंदर को हराकर दिल्ली पर पुनः अपना अधिकार प्राप्त कर लिया।

24 जनवरी 1556 को हुमायूँ दिल्ली में पुस्तकालय की छत पर गया था और वहां पैर फिसलने के कारण उसे गंभीर चोट आयी और 26 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु हो गयी।

हुमायु की इच्छा थी की उसे काबुल में दफनाया जाये। इसलिए हुमायूँ को काबुल में ही दफनाया गया।

जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर (1556 – 1605 ई.)

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को हुआ था। अकबर की माता का नाम हमीदा बानू और पिता का नाम हुमायूँ था। 1555 में हुमायूँ ने लौहार पर अधिकार करने के बाद अकबर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

जब अकबर की उम्र 13 वर्ष की थी तो हुमायूँ ने बैरम खाँ को अकबर का संरक्षक नियुक्त किया। 26 जनवरी 1556 को हुमायूँ की अकाल मृत्यु होने के बाद बैरम खाँ ने 14 फरवरी 1556 को अकबर को बादशाह घोषित कर दिया।

5 नवंबर 1556 को मुग़ल सेना और हेमू के मध्य पानीपत का दूसरा युद्ध लड़ा गया। जिसमे मुग़ल सेना की विजय हुई और हेमू मारा गया। इसके बाद अकबर ने दिल्ली और आगरा पर अपना अधिकार कर लिया।

बाद में अकबर को बैरम ख़ाँ के विद्रोह का सामना करना पड़ा। लम्बे संघर्ष के बाद आखिर में बैरम खाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया। अकबर ने बैरम खाँ को क्षमादान प्रदान किया और उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया।

1569 में जब बैरम ख़ाँ मक्का जा रहा था तो मुबारक खाँ लोहानी नाम के अफगानी ने बैरम खाँ की हत्या कर दी। यहाँ से अकबर का स्वतंत्र शासन प्रारम्भ हुआ।

अकबर ने राज्य में शांति व्यवस्था कायम की तथा विभिन्न प्रकार की जातियों और धर्म सम्प्रदायों के बीच में एकता की स्थापना के लिए कार्य किया। अकबर ने दीन-इलाही की स्थापना की थी।

अकबर के समय में मुग़ल साम्राज्य का और विस्तार हुआ। उसने दिल्ली, पंजाब, राजपुताना, मालवा, बिहार, बंगाल, गुजरात, उड़ीसा, काश्मीर, सिंध, काबुल आदि क्षेत्रो में अपना साम्राज्य स्थापित किया।

अकबर ने दक्षिण भारत की ओर भी रुख किया जहाँ उसने अहमदनगर, असीरगढ़ तथा अन्य विजय हासिल की। अपने जीवन के अंतिम दिनों में अकबर फतेहपुर सीकरी में रहा।

वहीँ उसने सलीम को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। अकबर बहुत बीमार रहने लगे थे। 16 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु हो गयी।

नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर (1605-1627 ई.)

जहांगीर के पिता का नाम अकबर और माता का नाम  हीराकंवर था। हीराकंवर  आम्बेर के राजा भारमल की पुत्री थी। जहांगीर के बचपन का नाम सलीम था।

अकबर की मृत्यु के बाद 25 अक्टूबर 1605 को जहांगीर मुग़ल सम्राट की गद्दी पर बैठा। जहांगीर का राजतिलक बड़ी धूम-धाम से किया गया। जहांगीर के राजतिलक के अवसर पर बहुत से बंदियों को रिहा किया गया।

जहांगीर ने जनता के बहुत से कर हटा दिए। जहांगीर के समय में आगरा में एक न्याय की घंटी घंटी लटकाई गयी। कोई भी न्याय के लिए इस घंटी को खिंचकर अपनी फरियाद मुग़ल सम्राट तक पहुंचा सकता था।

जहांगीर को अपने सबसे बड़े पुत्र खुसरो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। खुसरो पर जहांगीर ने पहरा लगा दिया। खुसरो अपमानित महसूस करने के बाद वहां से निकल गया।

इसके बाद जहांगीर और शहजादा खुसरो में भीषण संग्राम हुआ। जिसमे जहांगीर की जीत हुई और शहजादे खुसरो को जान बचाकर वहां से भागना पड़ा।

इसके बाद महाबतखाँ ने खुसरो को पकड़कर कैद कर लिया और उसे लाहौर लाया गया। इसी दौरान जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव की खुसरो की मदद करने के आरोप में हत्या करवा दी।

फिर कुछ दिन बाद खुसरो पर जहांगीर के खिलाफ षड्यंत्र करने के आरोप में अँधा करने की सजा दी गयी। महबत खाँ ने खुसरो को अँधा कर दिया। 1622 में शहजादा खुर्रम के षड्यंत्र से खुसरो की हत्या हो गयी।

जहांगीर का राजपूतों के साथ भी संघर्ष हुआ। अकबर के समय मेवाड़ पर अधिकार तो हो गया था लेकिन राजपरिवार ने मुग़लों की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।

जहांगीर ने मेवाड़ में राणा प्रताप सिंह के पुत्र राणा अमर सिंह को जीतने के लिए अपनी सेना भेजी। मुग़लों और राजपूतों में भीषण युद्ध हुआ लेकिन यह अनिर्णीत रहा। बाद में राणा अमर सिंह ने मुग़लों के साथ संधि कर ली।

जहांगीर ने दक्षिण में अहमदनगर के शासक मलिक अम्बर को भी संधि के लिए विवश किया। काफी संघर्ष के बाद मलिक अम्बर ने आखिर में मुग़लों से संधि कर ली।

जहांगीर के समय में अन्य विद्रोह भी हुए जैसे बिहार का विद्रोह, बंगाल का विद्रोह आदि। इन सभी विद्रोहों को जहांगीर ने दबा दिया।

1620 में जहांगीर ने कांगड़ा के दुर्ग पर आप अधिकार कर लिया। कंधार पर जहांगीर के ध्यान न देने का कारण 1622 में शाह अब्बास ने कंधार पर आक्रमण कर दिया।

जहांगीर के खिलाफ इस समय काफी षड्यंत्र रचा जा रहा था जिस कारण वह कंधार की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दे पाया और उसके हाथ से कंधार निकल गया। 1627 में लम्बी बीमारी के बाद जहांगीर का निधन हो गया।

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 शाहजहां (1628 -1658 ई.)

जहांगीर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र खुर्रम शाहजहां के नाम से मुग़ल सिंहासन पर बैठा। खुर्रम की उपलब्धियों के कारण जहांगीर ने उसे शाहजहां की उपाधि दी थी  । शाहजहां को उत्तराधिकार के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था।

जहांगीर के बीमार होते ही शाहजहां के अंदर सत्ता प्राप्त करने की इच्छा बढ़ गई। उसके सामने सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी शहजादा खुसरो था। खुसरो के विद्रोह करने के कारण उसे कारागार में डाल दिया गया। वहां शाहजहां ने उसकी उसकी हत्या करवा दी।

शाहजहां को अपने अन्य भाइयों तथा भतीजों से भी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन सबका दमन करने के बाद 6 फरवरी 1628 को शाहजहां मुग़ल सम्राट के सिंहांसन पर बैठा।

शाहजहां के समय विभिन्न प्रकार के विद्रोह भी हुए जिनमे प्रमुख है बुंदेला का विद्रोह, लोदी का विद्रोह। सिक्खों के छटवें गुरु हरगोविंद सिंह से भी शाहजहां का संघर्ष हुआ।

शाहजहाँ के समय में ख़ूबसूरत इमारतों का निर्माण किया गया। ताजमहल का निर्माण 1654 में पूरा हुआ। श्वेत संगमरमर से बनी यह अद्भुत इमारत आगरा में यमुना नदी के किनारे पर स्थित है।

ताजमहल का निर्माण शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में करवाया था। ताजमहल आज दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल है।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में शाहजहाँ को उसके पुत्र औरंगजेब ने कैद करके कारागार भेज दिया। शाहजहां उन दिनों ताजमहल को ही अपनी सूनी आँखों से देखता रहता था। 22 जनवरी 1666 को शाहजहां की मृत्यु हो गयी।

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मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब (1658 – 1707 ई.)

1657 में शाहजहां के बीमार पड़ते ही उसके चार पुत्रों दारा, शुजा, औरंगजेब और मुराद में सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया। इनमे से सबसे बड़े पुत्र दारा को शाहजहाँ बहुत चाहता था। शाहजहां की पुत्रियां भी सत्ता संघर्ष में शामिल हो गयी।

औरंगजेब ने अपने सभी भाइयों को पराजित कर दिया और अपने पिता शाहजहां को कारागार में डाल दिया। औरंगजेब ने खुद को 16 जुलाई 1658 को बादशाह के रूप में घोषित कर दिया।

औरंगजेब का औपचारिक राज्याभिषेक 1659 में दिल्ली में हुआ। औरंगजेब ने अब्दुल मुहम्मद मुहीउद्दीन और औरंगजेब बहादुर आलमगीर बादशाह गाजी की उपाधियों को धारण किया।

औरंगजेब को मुग़ल साम्राज्य में सबसे क्रूर शासक के रूप में जाना जाता है। कहा जाता है कि विशाल मुग़ल साम्राज्य की कमजोरी की शुरआत औरंगजेब के शासनकाल की नीतियों से ही हुई।

औरंगजेब के समय में विभिन्न विद्रोह हुए। जिनमे जाटों का विद्रोह, राजपूतों का विद्रोह, सिक्खों का विद्रोह आदि प्रमुख थे। सभी विद्रोहों को औरंगजेब ने क्रूरता के साथ कुचल दिया।

सिक्खों के साथ मुग़लों का संघर्ष 1606 में गुरु अर्जुन देव की हत्या से ही चलता आ रहा था। उसके बाद गुरु हरगोविंद का संघर्ष शाहजहां के साथ हुआ। जब गुरु तेग बहादुर सिक्खों के गुरु बने तो औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा।

औरंगजेब के समय में विभिन्न विद्रोह हुए। जिनमे जाटों का विद्रोह, राजपूतों का विद्रोह, सिक्खों का विद्रोह आदि प्रमुख थे। सभी विद्रोहों को औरंगजेब ने क्रूरता के साथ कुचल दिया। औरंगजेब ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया और विभिन्न युद्धों को जीता।

औरंगजेब ने सिक्खों के गुरु “गुरु तेग बहादुर” की इस्लाम स्वीकार न करने पर हत्या करवा दी। औरंगजेब का मराठों के साथ भारी संघर्ष हुआ और शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के मराठा साम्राज्य को जीतने की इच्छा पर पानी फेर दिया।

मार्च 1707 में औरंगजेब का निधन हो गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होता गया। 

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बहादुरशाह प्रथम (1707 – 1712 ई.)

औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पत्र बहादुरशाह प्रथम तख़्त पर बैठा। वह अपने पिता औरंगजेब की भांति कट्टर नहीं था। बहादुरशाह प्रथम ने राजपूतों के साथ संघर्ष के बाद उनके साथ संधि की नीति अपनाई।

उसने मराठों के साथ शांति स्थापित करने की कोशिश की। शाहूजी को बहादुरशाह के शासनकाल में ही कैद से मुक्त किया गया था।

इस प्रकार बहादुरशाह प्रथम ने औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता के उलट उदार नीति को अपनाया। 1712 में बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु हो गयी।

जहाँदारशाह (1712-1713 ई.)

बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हो गई। बहादुरशाह के पुत्र जहाँदारशाह ने मुग़ल सेनापति जुल्फिकार खाँ की सहायता से 1712 में तीनो शहजादों को मारने के बाद दिल्ली के तख़्त पर अपना अधिकार कर लिया।

वह ५१ वर्ष की उम्र में सम्राट बना। उसने शासन में कई महत्वपूर्ण फैसले किये जिनमे जजिया कर हटाना, राजपूत राजाओं से सम्बन्ध अच्छे करना, मराठों को उनके ही राज्य में उलझा कर रखना, सिक्ख विद्रोह का दमन आदि प्रमुख थे।

शासन सँभालने के कुछ माह बाद ही जहाँदारशाह को अपने मृत भाई अजीम-उश-शान के पुत्र फर्रुखसियार के विद्रोह का सामना करना पड़ा। फर्रुखसियर ने पटना में अपने आपको बादशाह घोषित किया और आगरा की ओर बढ़ने लगा।

जनवरी 1713 में आगरा के निकट जहाँदारशाह और फर्रुखसियर के बीच में युद्ध हुआ जिसमे जहाँदारशाह को को हार का सामना करना पड़ा। फरवरी 1713 में फर्रुखसियर ने जहाँदारशाह की हत्या करवा दी।

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फर्रुखसियर (1713-1719 ई.)

जहाँदारशाह के बाद उसके भाई अजीम-उश-शान का पुत्र फरुखसियर सय्यद बंधुओं की मदद से बादशाह बना। उसमे निर्णय लेने का अभाव और शासन का अनुभव् न होने के कारन शासन की बागडोर सैयद बंधुओं के हाथों में  आ गयी।

फर्रुखसियर ने बहुत कोशिश की कि सैय्यद बंधुओं का प्रभाव कम किया जाये लेकिन वह कामयाब नहीं हुआ। फर्रुखसियर के शासन में ही अजीत सिंह को विवश होकर अपनी पुत्री इंद्रा कुंवरी का विवाह फर्रुखसियर से करना पड़ा।

इस समय बंदा बैरागी मुग़लों के खिलाफ लड़ाई कर रहा था। फर्रुखसियर ने बंदा बैरागी और उसके सहयोगियों को बड़ी ही निर्ममता के साथ मार डाला। जाटों के विरुद्ध कुछ खास सफलता न मिलने के कारण 1718 में फर्रुखसियर ने चूड़ामन से संधि कर ली।

फर्रुखसियर ने सैय्यद बंधुओं के खिलाफ कार्यवाही करनी शुरु की। लेकिन सभी योजनाएं विफल रही। बाद में सैय्यद बंधुओं ने फर्रुखसियर के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर रफीउद्दौला को बादशाह बनाया और फर्रुखसियर को बंदी बना लिया।

फर्रुखसियर को यातनाएं देकर उसकी हत्या करवा दी गयी। रफीउद्दौला की भी कुछ महीने बाद ही मृत्यु हो गयी।

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मुहम्मदशाह (रंगीला) (1719-1748 ई.)

सैय्यद बंधुओं ने रफीउद्दौला की मृत्यु के बाद बहादुरशाह की बड़े पुत्र मुहम्मदशाह को 18 वर्ष की आयु में ही बादशाह बनाया। जिसे मुहम्मदशाह रंगीला के नाम से जाना जाता है। मुहम्मदशाह के चारों तरफ हर समय सैय्यद बंधुओं के आदमी रहते थे।

मुहम्मद शाह ने सैय्यद बंधुओं के  नियंत्रण से बाहर निकलने के लिए योजना बनायीं और लगभग 1  साल बाद वह सैय्यद बंधुओं का अंत करने में सफल हुआ।

मुहम्मदशाह के समय मुग़ल साम्राज्य की स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ने लगी। मुग़ल साम्राज्य के शाही फरमानों की अवहेलना होने लगी। दिल्ली की हालत धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।

1737 में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। उसने मुहम्मदशाह की सेनाओं को हरा दिया और  दिल्ली में कत्लेआम करने का आदेश दिया।

मुहम्मद शाह ने यह सब रुकवाने के एवज में नादिरशाह को मुग़ल कोष का बहुत बड़ा भाग दिया जिसमे विश्व प्रसिद्द कोहिनूर हीरा भी शामिल था। इसके अलावा काश्मीर से सिंध तक का भाग भी नादिरशाह को मिल गया।

नादिरशाह ने भारत में बहुत भारी तबाही मचाई। मुग़ल खजाना भी अब खाली हो चूका था। 1748 में मुहम्मदशाह की मृत्यु हो गयी।

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अहमदशाह(1748-1754 ई.)

मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अहमदशाह  बादशाह बना। वह एक अयोग्य एवं चरित्रहीन शासक था।

अब तक दिल्ली सल्तनत सिर्फ नाम के लिए ही रह गयी थी। लेकिन अहमदशाह हमेशा सुन्दर स्त्रियों से घिरा रहता था। उसके समय में शासन उधमबाई के हाथों में था।

अहमदशाह की अयोग्यता के कारण मुग़ल कोष पूरी तरह खाली हो गया। इस दौरान शासन व्यवस्था की दुर्गति हो गयी। सेवादारों और सैनिकों को वेतन ही नहीं मिलता था। सैन्य व्यवस्था भी कमजोर हो गयी थी।

आलमगीर द्वितीय (1754-1759 ई.)

अहमदशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात उसका पुत्र आलमगीर द्वितीय बादशाह बना। इसके समय ही अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर चौथा आक्रमण किया और भयंकर लूटपाट एवं तबाही मचाई। 1758 में आलमगीर द्वितीय की हत्या करवा दी गयी।

शाहआलम द्वितीय (1760-1806 ई.)

आलमगीर द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शाहआलम द्वितीय बादशाह बना। इसके समय में ही पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ था। 1765 में अंग्रेजों के साथ हुई संधि में ईस्ट इंडिया कंपनी ने उसे वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।

इस समय मुग़ल साम्राज्य की शक्ति कमजोर हो चुकी थी। यह समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय का समय था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अनेक राज्यों को हासिल कर लिया।

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अकबर द्वितीय (1806-1837 ई.)

शाहआलम द्वितीय के बाद अकबर द्वितीय मुग़ल सम्राट बना। उसने 1806 से 1837 तक लगभग 31 वर्षों तक शासन किया। मुग़ल साम्राज्य इस समय विघटित हो चूका था।

इस समय मुग़ल सम्राट सिर्फ नाममात्र के शासक थे। वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद से ही अपना जीवन चला रहे थे।

बहादुरशाह द्वितीय (1838-1857 ई.)

अकबर द्वितीय की मृत्यु के बाद बहादुरशाह द्वितीय मुग़ल सम्राट बने। उन्हें बहादुरशाह जफ़र के नाम से भी जाना जाता है। इस समय तक दिल्ली की सल्तनत बेहद ही कमजोर हालत में थी।

बहादुरशाह जफ़र ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जिसके फ़लस्वरूप ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके पुत्रों और प्रपोत्रों की हत्या करवा दी और उन्हें अपदस्थ करके रंगून भेज दिया। जहाँ 1862 में एक कैदी के रूप में उनकी मृत्यु हो गयी।

बहादुर शाह जफ़र अंतिम मुग़ल सम्राट थे। इस प्रकार बहादुरशाह जफ़र की मृत्यु के साथ ही भारत में मुग़ल शासन (Mughal History in Hindi) की समाप्ति हो गयी।

 

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